पति, पत्नी और वो

यह मेरी पत्नी की महानता है कि उसने मेरी सभी महिला-मित्रों, जिन्हें मेरी पत्नी मेरी गर्लफ्रेंड समझती थी, के प्रति तटस्थ भाव रखा। हम दोनों की इस विषय पर कभी लड़ाई नहीं हुई, सिवाय इसके कि मैं महिला-मित्रों के घऱ आने-जाने को मात्र आना-जाना कहता रहा और मेरी पत्नी इस आने-जाने को ताँता कहती रही।

जब कभी हमारा झगड़ा होता है और महिला मित्र घर आती हैं तो वो मेरे सामने मेरे बच्चों से मेरी महिला मित्रों को तीन-चार बार बुआ कहलवाकर नमस्कार करवाती है। यह उसका घोर षडयंत्र था। उसने हमेशा इस प्रतिज्ञा को निभाया कि भारत मेरा देश है और समस्त भारतीय मेरे भाई-बहिन है। वह प्रत्यक्ष-परोक्ष इस बात पर बल देती रही कि आमतौर पर एक पुरुष को और विशेष रूप से जिसे पति का दर्जा प्राप्त है, उसे इस प्रतिज्ञा को हर हाल में निभाना ही चाहिए।

यही कारण है कि समझदार पति घर से बाहर नहीं निकलते हैं। वह हमेशा सूर्पणखा से सूर्पणखा की नाक अलग होने के दौरान बकौल पण्डित रामेश्वर कथावाचक द्वारा कही गई पंक्ति सुनाती है कि-

हम क्वारे नहीं विवाहित हैं और एक नारी व्रत रखते हैं
अपनी को छोड़ परायी को माता और बहन समझते हैं।


यह भारतीय पति ही है, जो अपनी माँ-बहन के अतिरिक्त गाय को माँ और उसकी बछिया को तो अपनी बहन समझ सकता है, लेकिन औरों की माँ-बहन को वो औरों की माँ-बहन समझा करता है।

कभी-कभी वह उदारतावश औरों की माँ-बहन के साथ ऐसा व्यवहार करता है, जिसे देखकर आमतौर पर माँ-बहन यह कहती हैं कि तेरे घऱ में माँ-बहन नहीं हैं क्या?

अधिक दबाव पर घरेलू पति इस बात पर पत्नी से समझौता कर लेता है कि दूसरे की माँ को मैं अपनी माँ समझने को तैयार हूँ, लेकिन दूसरे की बहन को अपनी बहन समझने को तैयार नहीं हूँ।

जहाँ तक दूसरों की बीवियों का सवाल है, दूसरे की बीवियाँ एक प्रकार से दूसरे की बीवियाँ ही होती हैं, होती थीं और होती रहेंगी। हर पहले पुरुष यथा पति के लिए दूसरे की बीवियाँ ज्ञान, उत्सुकता, जिज्ञासा, शोध, बोध, आमोद-प्रमोद, विनोद, प्रतिशोध, क्रोध, अपहरण व भगा ले जाने का मुद्दा रही हैं।

यह कहा जा सकता है कि भारतीय पति का चरित्र बरसात के बाद की काली मिट्टी है, जहाँ फिसलन ही फिसलन है। आजकल इसी फिसलन के अवसर तलाशने को ही फैशन कहा जाता है और यही फैशन पैशन हो जाती है।

काली मिट्टी कुम्हार की थाप खाकर घड़ा हो जाती है और पत्नी के बेलन की थाप खाकर पति के चरित्र की वहीं की वहीं घड़ी हो जाती है।

यह पत्नियों का स्थायी षडयंत्र है कि उन्होंने मंगलसूत्र, सिंदूर व करवाचौथ के शाब्दिक खूँटों की रचना की, वरना पति आवारा साँड की तरह यत्र-तत्र-सर्वत्र चरता, विचरता और मरता।

औरत को भोग और भोजन मानने वालों को भी यह जान लेना चाहिए कि पत्नी घर की दाल-रोटी है और प्रेमिका रेस्टोरेंट का मसाला-डोसा।

पुरुष की ज़िन्दगी में वहीं ढील हो जाती है, जहाँ उसकी प्रेमिका पत्नी में तब्दील हो जाती है। ऐसे प्रेमी, पति प्रायः कुम्भीपाक नरक में जाते हैं और अन्त में अकबर इलाहाबादी याद आते हैं-

तआ़ल्लुक़ आशिको माशूक का जो लुत्फ़ रखता था।
मज़े अब वे कहाँ बाक़ी रहे बीवी-मियाँ होकर।
copyright 2010-2014 Sanjay Jhala