तेनोक्तम् - The legend says...

  • संजय मेरे परम प्रिय हास्य व्यंग्यकारों में से एक हैं- पद्म भूषण गोपाल दास नीरज


  • वे प्रथम श्रेणी के हास्य-व्यंग्यकारों की पंक्ति में आते हैं। वे आजकल की गुटबाज़ी, मंचीय राजनीति से दूर साहित्य साधनारत हैं। इन्होंने राजनीतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक विद्रूपताओं पर प्रयोगधर्मी व्यंग्य लेखन किया है, जो बेजोड़ है। वे एक ऐसे अच्छे, सच्चे हंसमुख इन्सान हैं, जो प्रेम करना जानते हैं, प्रेम देना जानते हैं। मेरी मान्यता है जो अच्छा इन्सान नहीं है, वो अच्छा कवि भी नहीं हो सकता। मेरी राय में संजय के समकालीन लोग इनसे अच्छा इन्सान व अच्छा कवि होना सीखें।


  • संजय देश के चर्चित हास्य कवियों में- बलवीर सिंह 'करुण'


  • संजय झाला को सुनना जितना प्रीतिकर है, पढ़ना उससे ज़्यादा रुचिकर है। मैंने संजय के काव्य के बचपन को घुटनों चलते देखा है और आज उसका यौवन देख रहा हूं। भाषा और शिल्प पर जितनी अच्छी पकड़ संजय की है, वह बहुत कम हास्य कवियों में देखी जाती है। पुराने ऐतिहासिक-धार्मिक पात्रों पर लिखना दुधारी तलवार पर चलने से कम नहीं होता, परन्तु संजय ने इसे भी कुशलता पूर्वक निभाया है। आज वो देश और दुनिया के चर्चित हास्य-व्यंग्यकारों में है। मैं भी उसके मंच कौशल से उतना ही प्रसन्न होता हूँ, जितना द्रोण अर्जुन का रण कौशल देखकर होते थे।


  • विभिन्न कलाओं के अद्भुत संगम हैं संजय - संतोष आनंद


  • एक व्यक्ति इतनी कलाएँ, इतना सौंदर्य, इतनी परिकल्पनाएं, इतने प्रयोग, इतनी स्पष्टता, इतनी गहराई, इतनी ज़मीन, इतना आसमान.. अगर इन सब का संगम मैंने किसी में देखा है, तो वो मात्र एक नाम है, संजय झाला। मेरे हृदय में इनका स्पंदन सदैव रहता है। मुझे पूरा विश्वास है कि ये आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बने रहेंगे। विभिन्न कलाओं के अद्भुत संगम संजय झाला को सदैव मेरा आशीर्वाद।


  • लेखन की कौन पाठशाला में पढ़े हो रे संजय झाला? - स्व. ओम प्रकाश 'आदित्य'


  • हास्य की नव उज्ज्वल जलधार
    व व्यंग्य के हिल्लोलित उच्छल प्रहार,
    अपने कथ्य के तथ्य की रंगत को शास्त्र संगत संस्तुति
    देने के लिए कहीं संस्कृत की सुभाषित-सु्क्तियाँ,
    कहीं हिन्दी के सद्ग्रंथों की सटीक उक्तियाँ।

    गीता के श्लोक, वेदों की ऋचाएं,
    पंचतंत्र के पात्रों का अद्भुत प्रयोग,
    कहीं तुम्हारे बहुमुखी पौराणिक ज्ञान से प्रसन्न
    और कहीं आधुनिकतम संचेतना से सन्न, प्रसन्न हो गया मन।

    कल्पना की दूरगामी तरंग,
    भावों की उत्साहित उमंग,
    मधुर भाषा में मकरंद की सुगंध,
    गद्य में पद्य का आनंद,
    विषय की अप्रतिहत गति
    न कहीं शैथिल्य न कहीं अति,
    सतत, सजग, समरसता में प्रति।

    हास्य की विद्युत छटा में व्यंग्य की घनघटा का गर्जन निराला,
    लेखन की कौन पाठशाला में पढ़े हो रे संजय झाला।


  • संजय का अंदाजे़ बयां और है... - स्व. अल्हड़ बीकानेरी


  • 'भ्रष्ट सत्यम् जगत मिथ्या' के व्यंग्य लेख पढ़कर ही मैंने विश्वास के साथ कह दिया था कि नई पीढ़ी के चर्चित व्यंग्यकारों की कतार में एक सशक्त एवं सुपठित रचनाकार की हैसियत से प्रिय संजय झाला ने अपनी धमाकेदार उपस्थिति दर्ज़ कर दी है। इनकी प्रत्येक रचना में हास्य-व्यंग्य का जो सहज तथा विरल विस्फोट हुआ है, वह यक़ीनन क़ाबिले ग़ौर है। वास्तव में चचा गालिब की तरह इनका अंदाज़े-बयां और है...


  • कविताओं में नाट्य प्रयोग से मंच को नई रोशनी दी - जैमिनी हरियाणवी


  • मैंने लेखन के प्रति संजय की लगन व समर्पण को देखा है, उसमें सीखने की ललक को देखा है। उसने हिन्दी मंच पर कविताओं में नाट्य-प्रयोग से जहाँ नई रोशनी दी है, वहीं अपने गद्य-व्यंग्य लेखन से साहित्यिक क्षेत्र में भी अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज़ कराई है। मंच और साहित्य के क्षेत्र में अपने निराले कहन से सराहे जाने वाले बहुत कम कवि हैं; संजय उनमें से एक हैं।


  • संजय का हास्य नये तेवर व ताज़गी वाला - सुरेन्द्र शर्मा


  • संजय झाला इस दौर के ऐसे कवि हैं, जिन्होंने हास्य को एक नए तेवर और ताज़गी के साथ प्रस्तुत किया है। उन्हें सुनना जितना सुखद लगता है, पढ़ना भी उतना ही सुखद है। वह उन महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों में हैं, जो हर जगह अपनी छाप छोड़ते हैं। उनके प्रस्तुति करण व लेखनी में जो तेवर हैं, वह उन्हें इस दौर के अन्य रचनाकारों से महत्वपूर्ण बनाता है।


  • संजय का कहन, शैली और प्रस्तुति करण कमाल - डॉ. अशोक चक्रधर


  • संजय झाला जिस मंच पर भी रहते हैं,
    वहां अपनी कविताओं से मचा देते हैं धमाल।
    उनकी कविताएं सुनकर बरबस ही श्रोता
    देने लगते हैं तालियों की ताल,
    क्योंकि उनका कहना भी कमाल, शैली भी कमाल
    और प्रस्तुति करण भी कमाल।


  • संजय नाट्य प्रयोग से मालामाल - हुल्लड़ मुरादाबादी


  • संजय झाला उम्र भर करते रहे कमाल
    सफल नाट्य प्रयोग से हैं ये मालामाल
    व्यंग्य से काव्य सजाया
    मंच पर उसको गाया।


  • संजय के व्यंग्य में दृष्टि आकार लेती है - डॉ. शिव शर्मा, व्यंग्यकार एवं अध्यक्ष, अखिल भारतीय टेपा सम्मेलन


  • टेपा सम्मेलन में संजय झाला काव्यधारा से मैं निश्चित ही प्रभावित हुआ, लेकिन उनके व्यंग्य पढ़कर सुखद आश्चर्य हुआ।
    बहुत कम लोग ही हैं, जो मंच पर काव्य पाठ करने के साथ सोच-समझ कर व्यंग्य लेखन कर लेते हों।
    संजय के व्यंग्य में दृष्टि आकार लेती दिखाई देती है।


  • संजय विद्वान व मौलिक कवि - माणिक वर्मा


  • आज अगर कोई मुझसे पूछे कि आपकी हास्य-व्यंग्य की विधा में युवा पीढ़ी में मौलिक विद्वान और आपकी विधा को पूरी निष्ठा एवं अस्मिता के साथ समर्पित कौन कवि है, तो निश्चित जिस कवि का नाम मेरे होंठों पर बरबस आएगा, उसका नाम संजय झाला होगा। कलकत्ता कवि सम्मेलनों के प्रवास के दौरान पहली बार 10-12 दिन संजय मेरे साथ रहे, जिसमें मैं यह तय नहीं कर पाया कि वे श्रेष्ठ कवि ही नहीं, वरन् विद्वान कवि के साथ इन्सानियत से ओत-प्रोत कवि हैं। वे इन्सान बड़े हैं या कवि बड़े हैं, जब भी आप इनसे मिलोगे तो आप भी मेरी ही तरह उलझन में पड़ जाओगे। इस खूबसूरत, श्रेष्ठ, विद्वान एवं मौलिक कवि को एक नेक इन्सान के रूप में पाकर काव्य मंच अपने आपको गौरवान्वित महसूस कर रहा है। मेरा मानना है कि एक बड़ा इन्सान ही बड़ा कवि होता है और इन दोनों गुणों के मालिक है संजय झाला।


  • संजय की व्यंग्य की भाषा पर पकड़ - ज्ञान चतुर्वेदी


  • मंच की कविता से गद्य-व्यंग्य में प्रवेश के अपने मज़े भी हैं और लाभ भी और सीमाएँ भी। संजय के व्यंग्य इन तीनों बातों के उदाहरण हैं। व्यंग्य की भाषा पर इनकी पकड़ है और यह बात व्यंग्य कविता के लम्बे अभ्यास की देन, अति सरलता से विषयों का निर्वाह तथा हटकर इधर-उधर की बातों में लगजाना यह भी मंच पर कविताएँ पढ़ने के अभ्यास के कारण है।


  • संजय व्यंग्य में गांधीवादी - प्रेम जन्मेजय


  • संजय झाला बहुमुखी हास्य-व्यंग्य प्रतिभा से युक्त हैं और यह इसी प्रतिभा का परिणाम है कि वह विसंगतियों को हास्य-व्यंग्य के रूप में अभिव्यक्त करने के लिए संप्रेषण के विभिन्न भाषिक माध्यमों का प्रयोग करते हैं। उनके पास वैचारिक सोच व प्रहारात्मक क्षमता है। विसंगतियों की पहचान की गहरी दृष्टि है और भाषा का तेवर है। संजय झाला अपनी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं धार्मिक वैषम्य की चिंताओं से युक्त आरंभिक बिन्दु पर हथियारों से लैस खड़े हैं, परन्तु अपने दुश्मन पर प्रहार करते हुए वे गांधीवादी हो जाते हैं।


  • उसके व्यंग्यकार के पास एक दिव्य दृष्टि - पूरन सरमा


  • संजय झाला का व्यंग्यकार आस-पास की अनेक विद्रूपताओं पर हाथ रखता है और सूक्ष्म छिद्रान्वेषण कर पाठक के सामने सच लाता है। उनके व्यंग्यकार के पास एक दिव्य दृष्टि भी है, जिससे उसने आँखों से देखे जाने वाले सच को भी बारीकी से पकड़ा है।
    संजय मूलतः एक मंचीय कवि हैं, इसलिए उनके व्यंग्यों में हास्य काफी उभरा है।


  • हास्य की फुहारों से सबको आनंदित करने वाला कवि - डॉ. कुंअर बेचैन


  • संजय झाला एक ऐसे बादल का नाम है, जिसका रचना संसार जेठ की दुपहरी में रेगिस्तान की तपती रेत पर इन्सान के शीश पर छाया करता है, तो कभी हास्य की फुहारों से नहलाकर उसे आनंदित करता है। यही नहीं, वो कभी अपने व्यंग्यों की चपला के आलोक से विसंगतियों को उजागर करता है, जो समाज में व्याप्त हैं। वह केवल उजागर ही नहीं करता, वरन् उनके व्यंग्य की बिजली विद्रूपताओं पर टूटकर गिराता ही है। संजय चाहे मंच पर हों, चाहे पत्र-पत्रिकाओं में या पुस्तकों के पृष्ठों पर, वह अपनी संवेदनशीलता से भरी-पूरी रचनाओं से सबका मन मोह लेते हैं, संक्षेप में कहूँ तो उनके बारे में यही कहा जा सकता है- उनके मन में बिजली की तड़प भी है, जो व्यंग्य बनकर सामने आती है। उनमें रसवंती फुहार भी है, जो हास्य बनकर बिखरती है। उनमें सम्पूर्ण व्यक्तित्व की वह शीतलता भी है, जो थके-हारे और धूप में जलते इन्सान को छाया देती चलती है। मेरा स्नेह और आशीष सदैव मेरे इस प्रिय रचनाकार के साथ है।


  • कविता के नए प्रयोगों का श्रेय संजय के खाते में - हरि ओम पंवार


  • संजय काव्य मंचों पर कविता को अभिनय, अनुकृति व प्रस्तुतिगत अभिनव प्रयोगों को साथ लेकर आए। नयेपन और ताज़गी के कारण श्रोताओं ने तो उन्हें हाथो-हाथ लिया। मैं प्रारंभ में उनका पक्षधर नहीं था। कालांतर में उन्होंने अपनी अलग शैली ईजाद कर कविता में अभिनय-अनुकृति को सर्व स्वीकार्य बना दिया। एक दिन यात्रा में मैंने उसका व्यंग्य आलेख पढ़ा, मैं दंग रह गया। मैंने खूब ठहाके लगाए। मैं उसकी लेखनी से पूर्णतः प्रभावित हुआ और प्रवाहित भी। मंच पर कविता में अभिनय व नाट्य प्रयोग शैली को विस्तार देने का श्रेय संजय के खाते में है।


  • संस्कारों का संवर्द्धन करने वाला रचनाकार - अतुल कनक


  • संजय झाला सधे हुए व्यंग्य के माध्यम से संस्कारों का संवर्द्धन करने वाला रचनाकार है। वह विकृतियों पर प्रहार करता हुआ गुदगुदाता है, तो सत्य, शिव और सुंदर के संरक्षण की दिशा में बहुत कुछ ज़रूरी सोचने पर विवश भी करता है। वह अच्छा रचनाकार तो है ही, संवेदनाओं के साथ जीने वाला बहुत अच्छा इन्सान भी है। इसीलिए उसे सुनकर, गुनना और उसकी संगत में रहकर ऐसा लगता है कि मानो घर की मुंडेर पर बैठे किसी पक्षी ने सुबह-सुबह चहचहाना शुरू कर दिया हो। इस चहचहाहट को सुनकर कौन होगा, जिसके मन में जागरण प्रफुल्लता बन नहीं जागेगा।
copyright 2010-2014 Sanjay Jhala