संजय का लेखन स्वतःस्फूर्त एवं अनायास

व्यंग्य विधा के पंच महाभूत माने गए हैं, हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, रवीन्द्र नाथ त्यागी, श्रीलाल शुक्ल और के.पी. सक्सेना। इनके लेखन में पंचतत्त्वों को परिभाषित किया जाए तो परसाईजी में 'वैचारिक प्रतिबद्धता', शरद जोशी में 'शैली के नए अवयवों का प्रयोग', त्यागीजी में 'अध्ययन की उद्धरणी', श्रीलाल शुक्ल में 'कहन की कारीगरी' और के.पी. सक्सेना के लेखन में 'भाषिक चटखारे' हैं।

समर्थ व्यंग्यकार संजय झाला ने अलग-अलग पड़े इन पंच व्यंग्य तत्त्वों को एकीकृत कर इन्हें सार्थक और सशक्त रूप में प्रस्तुत किया है। दशकों बाद सम्पूर्ण चेतना, समग्रता और आत्म विश्वास के साथ व्यंग्य के बंद कपाटों को संजय झाला ने पूरी ताकत के साथ खटखटाया है।

जहाँ इनका लेखन स्वतःस्फूर्त एवं अनायास है, वहीं उसकी अन्य विशेषताएँ भी हैं। संजय झाला अपने व्यंग्य लेखों में अव्यवस्थाओं को हास्य के माध्यम से दण्डित करते हैं। इनके लेखन में हास्य अपने विशद् आनन्द से हटकर प्रयोजननिष्ठ होता हुआ व्यंग्य का मार्ग पकड़ता है। यही व्यंग्य की सिद्धता और सार्थकता है। संजय झाला के पास विराट व्यंग्य-दृष्टि है। व्यापक दृष्टिकोण है। उनके लेखन में विद्रूपताओं और विसंगतियों पर आँखों से आंसू बह जाने वाली ताज़गी, शुद्धता, स्वच्छता और स्निग्धता है।

- राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, इलाहाबाद, पटना
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